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    राज-काज: भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनते डॉ. मोहन यादव

    दिनेश निगम ‘त्यागी’

    डॉ माेहन यादव जब मप्र के मुख्यमंत्री बने तब भले अधिकांश लोगों को नेतृत्व का निर्णय चौंकाने वाला लगा हो, लेकिन अब पता चल रहा है कि वे भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति का मुख्य हिस्सा हैं। पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। बिहार, उप्र सहित कई प्रदेशों में डॉ यादव का उपयोग उसी तरह किया जा रहा है, जिस तरह कभी पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती एवं कल्याण सिंह का लोधी मतदाताओं को साधने के लिए किया गया था।

    बिहार और उप्र में भाजपा की चिंता का कारण यादव मतदाता है। बिहार जाकर मोहन यादव ने जो किया, वही वे उत्तर प्रदेश में जाकर कर सकते हैं। बिहार पहुंचने पर डॉ यादव को हाथोंहाथ लिया गया। उनका जबरदस्त स्वागत हुआ। मोहन ने श्रीकृष्ण के उद्धरण देकर यादव समाज को प्रभावित करने की कोिशश की। इतना ही नहीं, उन्हें आमंत्रण दे दिया कि जिसकी इच्छा हो मप्र आए, रहे और व्यवसाय भी करे।

    इस तरह डॉ मोहन ने बिहार में यादव समाज के दिलों को छूने और खुद के साथ जोड़ने की आत्मीय कोशिश की। उनका अगला दौरा उप्र का होने वाला है। दोनों प्रदेशों में यादव मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है। इनकी बदौलत ही बिहार में लालू, तेजस्वी और उप्र में मुलायम सिंह के बाद अखिलेश यादव राजनीतिक ताकत बने हुए हैं। भाजपा मोहन के जरिए इस समाज पर सेंधमारी की तैयारी में दिखती है।

    कैलाश के सधे कदम, सबसे आकर्षक बंगले पर नजर

    विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ चर्चित बयान देने के बाद प्रदेश के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय अब सतर्कता से सधे कदम रखने लगे हैं। धैर्य का परिचय देते हुए पहले उन्होंने अपना पसंदीदा नगरीय प्रशासन विभाग लिया। फिर सूर्य के उत्तरायण आने के बाद विभाग का कार्यभार संभाला। अब उनकी नजर सबसे आकर्षक भूपेंद्र सिंह के सरकारी बंगले पर है।

    खबर है कि यह बंगला उनके नाम आवंटित करने की फाइल मंत्रालय में चल रही है। बंगला चर्चित इस मायने में है कि कभी यह ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते थे। इसके बाद तत्कालीन कमलनाथ सरकार के कई दिग्गजा मंत्री इस बंगले के लिए कतार में लग गए। इस बीच भूपेंद्र सिंह के आग्रह पर कमलनाथ ने बंगला अपने सांसद बेटे नकुलनाथ के नाम कर दिया लेकिन इसे भूपेंद्र सिंह के पास ही रहने दिया। अब भूपेंद्र सिंह विधायक तो हैं लेकिन मंत्री नहीं।

    इसलिए कैलाश यह बंगला हासिल करने के प्रयास में हैं। मंत्री बनने से पहले कैलाश के कई बयान चर्चा में रहे थे। पहले उन्होंने टिकट मिलने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि वे विधानसभा का चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते। इसके बाद प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे विधायक बनने के लिए चुनाव थोड़ा लड़ रहे। चुनाव बाद उन्हें बड़ी जवाबदारी मिलेगी। अब अपने कद के अनुसार मुकाम हािसल करने वे सधे कदम रखने लगे हैं।

    कमलनाथ के सामने अपनी साख बचाने की चुनौती….!

    कांग्रेस के दिग्गज कमलनाथ प्रदेश में सरकार बनाने के सपने देख रहे थे। समर्थक उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर रहे थे। सांसद बेटे नकुलनाथ ने कमलनाथ द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की तारीख तय कर लोगों को उसमें आने का न्यौता तक दे डाला था। ऐसे कमलनाथ राजनीति में सबसे संकट के दौर से गुजर रहे हैं।

    मुख्यमंत्री बनना ताे दूर, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिलने वाली सीटें ही लगभग आधी रह गईं। उनकी मर्जी के बगैर जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की नियुक्ति हो गई। उनके मुख्यमंत्री रहते ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा हुई थी, अब कमलनाथ खुद अपनों के निशाने पर हैं। उनके भाजपा में जाने की चर्चाओं ने जोर पकड़ रखा है।

    कांग्रेस के तेजतर्रार राष्ट्रीय प्रवक्ता आलोक शर्मा ने ही उन पर कई गंभीर आरोप जड़ दिए हैं। आलोक को पवन खेड़ा की तरफ से नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। स्पष्ट है कि कमलनाथ की राजनीतिक साख खतरे में हैं। पहले वे प्रदेश के सभी बड़े नेताओं को हाशिए पर डाल कर चल रहे थे, अब कोई उनके समर्थन में बोलने के लिए तैयार नहीं।

    कमलनाथ के सामने अपनी राजनीतिक साख के साथ छिंदवाड़ा को बचाने की चुनौती भी है। बेटे नकुलनाथ को भी उन्हें मुख्य धारा में बनाकर रखना है। इसीलिए सवाल पैदा हो रहा है कि कहीं कमलनाथ भाजपा का दामन तो नहींे थाम लेंगे ?

    अपनी इस घोषणा पर अमल कर पाएंगी साध्वी उमा….!

    पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती खुद अपनी साख पर बट्टा लगाने का कारण बनी हुई हैं। वे ऐसी घोषणाएं करती हैं, जो पूरी नहीं कर पातीं। बाद में उन्हें लेकर कोई बहाना ढूंढ़ना पड़ता है। अब उन्होंने भोपाल में अपनों से कहा कि वे आप सबसे विदाई ले रही हैं। संभव है यह आपसे आखिरी मुलाकात हो और वे फिर कभी भोपाल न आएं।

    उनका कहना था कि अब शेष समय वे अपने गांव में बिताएंगी। फिर सवाल वही, क्या उमा अपनी इस घोषणा पर अमल कर पाएंगी? इससे पहले उमा घोषणा कर चुकी हैं कि वे 2024 में लोकसभा चुनाव लड़ेंगी। सवाल है कि यदि वे गांव में रहेंगी तो लोकसभा चुनाव कैसे लड़ेंगी? इससे पहले भी उमा घोषणा कर चुकी थीं कि अब वे कभी सरकारी बंगले अथवा पक्के मकान में नहीं रहेंगी।

    वे शहर से बाहर कुटिया, नदी किनारे अथवा जंगल में झोपड़ी बनाकर रहेंगी। उनकी यह घोषणा भी पूरी नहीं हुई। कभी वे शिवराज सरकार से नाराज नजर आती थीं और कभी उनकी तारीफ के पुल बांधतीं। अब उन्होंने कह दिया कि वे शिवराज की प्रवक्ता नहीं हैं और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की तारीफ करने लगीं। उमा जी को चाहने वालों की तादाद कम नहीं है।

    लेकिन उनके हर रोज बदलते बयानों से वे दुखी हैं। इसलिए साध्वी उमा को अपना स्टेंड क्लियर रखना चाहिए और उस पर अडिग भी, ताकि लोग उनकी बातों पर भरोसा करने लगें।

    दिग्विजय को फिर याद दिलाना पड़ा ‘मैं सनातनी हिंदू’

    देश का कोई भी संवेदनशील मुद्दा हो, खास कर धर्म और हिंदुओं से जुड़ा, और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह न बोलें, यह हो नहीं सकता। भाजपा भी इंतजार में रहती है कि कब दिग्विजय बोलें और वह कांग्रेस पर हमला करे। अयोध्या में बन रहे मंदिर और भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा मामले में भी यही हुआ। दिग्विजय सिंह ने कई सवाल उठा दिए।

    पहले उन्होंने शंकराचार्यों के रुख को आधार बना कर टिप्पणी की। इसके बाद रामलला विराजमान मूर्ति को लेकर सवाल खड़े किए। राम मंदिर के कर्ता-धर्ता चंपत राय पर भी आरोप लगाए। भाजपा जब चारों तरफ से हमलावर हुई, तब बचाव में हमेंशा की तरह उन्हें फिर अपने परिवार का इतिहास बता कर कहना पड़ा कि ‘मैं सबसे बड़ा सनातनी हिंदू हूं।’

    दिग्विजय ने यह पहली बार नहीं कहा, इससे पहले भी वे कई बार यह दावा कर चुके हैं। सवाल है कि दिग्विजय ऐसा बोलते ही क्यों हैं, जिसकी वजह से भाजपा को हमला करने का मौका मिले। वह दिग्विजय के साथ कांग्रेस को भी राम, धर्म और हिंदू विरोधी ठहराती है और दिग्विजय को सफाई में खुद को सबसे बड़ा हिंदू होने का दावा करना पड़ता है।

    क्या दिग्विजय खुद को ऐसे मामलों में बोलने से खुद को रोक नहीं सकते? यदि वे ऐसा कर पाएं तो इससे उनका भला होगा और कांग्रेस का भी। उन्हें बार बार खुद को सबसे बड़ा हिंदू भी नहीं साबित करना पड़ेगा।

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