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    ग्रामोदय के छात्र ने फांसी लगा कर दी जान

    सतना। चित्रकूट स्थित महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय के एक छात्र ने फांसी के फंदे पर झूल कर अपनी जान दे दी। छात्र का शव उसके कमरे में फंदे पर झूलता पाया गया। अब उसकी मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। अन्य छात्रों और परिजनों ने डीन और प्रोफेसर पर प्रताडऩा का आरोप लगाया है। पुलिस ने मामले को जांच में ले लिया है। जानकारी के मुताबिक, महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट के कृषि संकाय में पढऩे वाले बीएससी के छात्र मादेश जमरे पिता घमर सिंह जमरे निवासी छिरवा खरगोन ने फांसी के फंदे पर झूल कर आत्महत्या कर ली थी। उसका शव शनिवार को उसके कमरे में पाया गया था। चित्रकूट थाना पुलिस ने पंचनामा बना कर शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया था और मृतक के परिजनों को सूचना दे दी थी। रविवार को जब मृतक के परिजन खरगोन से चित्रकूट पहुंचे तो इस मामले ने नया मोड़ ले लिया। परिजनों ने मादेश की खुदकुशी के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति, कृषि संकाय के डीन डीपी राय और कुलानुशासक पवन सिरोठिया जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुलपति, डीन और कुलानुशासक ने मृतक मादेश को बिना किसी कारण अथवा सूचना के 2 माह पहले युनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया था। उसने कई बार कुलपति, डीन और कुलानुशासक से आग्रह किया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वह दो महीने तक चक्कर काटता रहा और अंतत: परेशान हो कर उसने खुदकुशी कर ली। मादेश के परिजनों को इन आरोपों पर विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों का भी सपोर्ट मिला है। छात्रों ने भी इस मामले में प्रबंधन पर कार्रवाई की मांग छेड़ दी है। बताया जाता है कि कुछ दिनों पहले युनिवर्सिटी के बाहर कुछ छात्रों के बीच झगड़ा हुआ था। इस विवाद पर प्रबंधन ने संज्ञान लेते हुए चार छात्रों को निष्कासित कर दिया था जिनमें मृतक मादेश भी शामिल था। हालांकि मृतक के भाई राजेश जमरे और राहुल जमरे का दावा है कि विवाद में मादेश शामिल नहीं था। बावजूद इसके एक्शन होने से वह परेशान था। बहरहाल, चित्रकूट पुलिस ने छात्र की मौत के कारणों की जांच शुरू कर दी है। निष्कासित किए गए छात्रों ने बताया कि जिस विवाद को आधार बना कर बिना किसी नोटिस हम पर कार्रवाई की गई। उसमें पुलिस ने ही समझौता करा कर प्रकरण खत्म करा दिया था। लेकिन कुलानुशासक पवन सिरोठिया जाने किस बात की खुन्नस पाले बैठे थे कि वे हम सब को आतंकवादी बोलते थे और निष्कासित कराने की चेतावनी देते थे। उन्होंने निष्कासन करवा भी दिया। बाद में जब उनसे आग्रह किया गया तब भी वे बेहद अभद्रता से बात करते थे।

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