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    भविष्य की आहट: आस्था को बनाया जा रहा है वर्चस्व का हथियार

    डाॅ. रवीन्द्र अरजरिया

    भविष्य की आहट के इस कॉलम में आज हम बात करेंगे भारत में ‘आस्था को बनाए जा रहे वर्चस्व का ह​थियार’ विषय पर।  अयोध्या में श्रीराम के बाल विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से देश-दुनिया में बयानबाजी के माध्यम से अशान्ति फैलाने का काम शुरू हो गया है। भडकाऊ वक्तव्य, पुराने वीडियो और नयी मनगढन्त संभावनाओं का बाजार गर्म है।

    कट्टरता के बीज बोने वाले सक्रिय हो गये हैं। अनेक संगठनों के देशी-विदेशी संस्थान जहर उगलने लगे हैं। क्रिया पर प्रतिक्रियायें भी सामने आ रहीं हैं। आस्था को वर्चस्व का हथियार बनाया जाने लगा है। श्रध्दा को दिखावे, भक्ति को भौंकाल और आत्मिक शान्ति को प्रदर्शन की वस्तु बना दी गई है। निजिता के आयामों को बाजार की सडकों पर दुकानों की तरह सजाया जाने लगा है। स्वयं की संतुष्टि के लिए किये जाने वाले परा-विज्ञान के प्रयोग अब चौराहों पर आकार लेने लगे हैं।

    श्रीराम आस्था के मुद्दे को विवादित बनाने वाले कुछ राजनैतिक दल स्वयं को लोकतंत्र का सबसे बडा पोषक बनाकर प्रस्तुत करते आये हैं जबकि ऐसे दल की केन्द्रीय सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान ही धर्म के संबंध में कानूनी दांव खेलाकर सत्ता पर काबिज रहने की अपनी मंशा को जाहिर कर दिया था। देश के आन्तरिक मामलों में दूसरे देशों का कूदना, मानवता की आड लेकर हो-हल्ला मचाना तथा मनगढन्त आंकडों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना निरंतर जारी है।

    स्वयं गुड खाने वाले वाले दूसरों को गुड न खाने की सीख देने पर आमादा हैं। देश से पदम्म पुरस्कार पाने वाले भी ज्ञानवापी पर मंदिर की स्वीकारोक्ति देते हुए हालातों पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर रहे हैं। आखिर कब तक ऐसा चलता रहेगा, जैसे सवाल करने वाले शायद यह कहना चाहते हैं कि जहरीली चालों की दम पर गुलाम बनाने वाले जुल्म करते रहे हैं, करते रहेंगे और शान्ति को अंगीकार करने वाले जुल्म सहते रहे हैं, सहते रहेंगे। यदि गुलामी के निजात पान गलत था तो फिर देश को आजाद कराना ही नहीं चाहिए था। दासता की बेडियों को ही मुकद्दर मान लेना चाहिए था।

    मानवीय प्रकृति के वशीभूत होकर ही विरासत वापिस लेने की मानसिकता पनपती है। परतंत्रता के निशान भी जुल्म के नासूरों को निरंतर बहा रहे हैं। कहीं सुलतान रहने का अहंकार जागता है तो कहीं गुलाम रहने की पीडा कसकती है। सांस्कृतिक विरासत और आस्था के आदर्श अलग-अलग होते हैं किन्तु वर्तमान में देश की प्राचीन संस्कृति को धर्म से जोडकर परोसा जाने लगा है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही राजनीति के नाम पर कुटिल नीतियां, चालाकियां और चालबाजियां चरम सीमा की ओर बढ चलीं थीं।

    वास्तविक राष्ट्र-भक्तों को फांसी के फंदों तक पहुंचने वालों ने ही गोरों की कठपुतली बनकर मां भारती की पीठ में खंजर भौंकने का काम किया था। प्राचीन संस्कति के अनुसार व्यक्तिगत रूप से मानसिक संतुष्टि के लिए किये जाने वाले उपाय हमेशा से ही एकान्त में ही होते रहे हैं। उन्हें चिल्लाकर करने की मनाही थी। देवालयों में भी छोटी सी घंटी के सहारे आरती का गायन किया जाता था। घरों के आंगन में ही श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह आदि आयोजित होते थे। अत्यन्त धीमे स्वर में मंत्र जाप का विधान था।

    परिवार के साथ मिलकर धार्मिक आयोजन किये जाते थे। एक सी मानसिता के पोषक पडोसी ही इन आयोजनों में भागीदारी दर्ज करते थे। कभी सडकों पर, चौराहों पर पूजा-पाठ करने वालों का जमावडा नहीं होता था। आक्रान्ताओं के आते ही चीख चिल्लाहट मची। आराधना के लिए जोर-जोर से आवाजें दी जाने लगीं। वर्चस्व दिखाने के लिये देवालय ढाये जाने लगे। धर्म परिवर्तन के फतवे जारी हुए। लालच के वशीभूत होकर ज्यादातर लोगों ने सत्ता का हुकुम मानकर उनके अनुरूप आचरण शुरू कर दिया।

    आस्था की जमातें आस्थानों से निकलकर सडकों, चौराहों पर फट्टा बिछाकर इबादत करने लगीं। दिखावे का चलन तेज होता चला गया। विकास के साथ-साथ प्रदर्शन का आकार बढा और सुबह से लेकर शाम तक रह रहकर आस्थावानों को एकत्रित करने के लिए आवाजें निकाली जाने लगीं। आधुनिक यंत्रों का सहारा लिया गया। माइक लगाये गये। स्पीकर्स की आधिकतम सीमा तक स्वरों को विस्तार दिया गया। निर्धारित समय पर सडक, चौराहों से आगे बढकर बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, माल, शापिंग काम्पलेक्स आदि स्थानों पर आस्था के अम्बार लगते चले गये। खास दिनों में तो रास्ते जाम किये जाने लगे।

    जनबल, धनबल और बाहुबल दिखाने का फैशन चल निकला। प्रतिस्पर्धा में दूसरे समुदाय ने भी धार्मिक सप्ताहों के आयोजन हेतु सडकों, रास्तों और चौराहों का चयन किया। शान्ति के लिए किये जाने वाले निजी उपाय अब दिखावे की वस्तु बन गई। वर्तमान में तो कान फोडने वाले ध्वनि विस्तारक यंत्रों की धमक से दिल के दरवाजे पर थाप होने लगती है परन्तु उस पर लगाम लगाने वाले फरमान भी सरकारी मशीनरी की जंग दूर नहीं कर पा रहे हैं। आयोजन कराने वाला स्वयं उसका आनन्द नहीं ले पाता है।

    उसके जिम्मे तो आगन्तुकों की आवभगत ही रहती है। ऐसे में व्यक्ति की निजिता से जुडी आस्था ने प्रदर्शन की चरम सीमा की ओर तीव्र गति से दौड लगाना शुरू कर दिया है। इसके लिए पर्दे के पीछे से षडयंत्र करने वाले ठेकेदारों की एकमात्र भूमिका होती है। यह ठेकेदार देश के अन्दर बैठकर विदेशी पैसों पर खून की होली खेलने के लिए हमेशा ही तैयार रहते हैं।

    ऐसे लोगों को बेनकाब करने, उन्हें मुंहतोड जबाब देने और वास्तविक मानव धर्म स्थापित करने के लिए जब तक आम आवाम खडा नहीं होता, तब तक देश-दुनिया में वर्चस्व कायम करने के लिए आस्था को हथियार बनाना बंद नहीं हो सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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