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    भविष्य की आहट: सामाजिक वैमनुष्यता फैलाने का प्रयास है जातिगत जनगणना

    डाॅ. रवीन्द्र अरजरिया

    अंग्रेजों की नीतियों को सफलता का मूलमंत्र मानने वालों ने देश के अन्दर ही घातक चालों से निरंतर सत्ता-सुख हासिल किया है। ‘फूट डालो-राज करो’ का जादू सिर चढकर बोलता रहा है। पूर्व निर्धारित षडयंत्र का व्यवहारिक स्वरूप सामने आया। देश के दो टुकडे हुए। एक ने मजहब के नाम पर अलग पहचान बनाई तो दूसरे ने उदारवादिता को हथियार बनाया। हाथी के दो दांतों ने अनेक रूप लेने शुरू कर दिया। स्वाधीनता के दौरान हिन्दू-मुसलमान के मध्य खाई खोदी गई।

    अपनों से ही अपनों की हत्या करवाई गई जबकि स्वतंत्रता के लिए सभी ने मिलकर संघर्ष किया था। अंग्रेजों की चालों को लेकर विलायत से वापिस लौटे लोगों ने कठपुतली की तरह करतब दिखाये और निरीह लोगों के खून से धरती का रंग लाल होता चला गया। समय के साथ षडयंत्र की जडें गहराती चलीं गईं। एक ही धरती के अन्न, जल, वायु और आकाश में पले-बढे लोगों को मजहबी जहर पिलाया जाता रहा। ज्यादातर तकरीरों और प्रवचनों में सत्य की पहचान कराने वाली धार्मिक पुस्तकों की मनमानी व्याख्या होती रही।

    जागरूकता, चालाकी और संचार साधनों की कमी के कारण इंसानियत के मध्य जीने वाले भोले-भाले लोगों ने धर्म गुुरूओं की बातों को ही मजहब-धर्म मान लिया। जन्नत-स्वर्ग के ख्याली पुलाव का मजा देकर लोगों को उन्मादी बना दिया गया। यह सब कुछ एक दिन में नहीं हुआ। धीमा जहर आहिस्ते-आहिस्ते मौत को नजदीक लाता है। हिन्दू-मुसलमान की बढती खाई के साथ-साथ अन्दर भी दरारें डालने की कोशिशें होने लगीं। इस्लाम को मानने वालों में सुन्नी, शिया तथा खारिजी आदि की मान्यतायें उभारी गईं।

    इसी तरह हिन्दुओं में भी बामपंथी और दक्षिणपंथी विभाजन को तेजी से सामने लाया गया। समय के साथ सुन्नियों को हनफी, शाफई, मलिकी, सूफी, हम्बाली, देवबंदी, वहाबी, सलफी, बरेलवी आदि के मध्य दूरियां पैदा करायी गईं जबकि शियाओं में इशाना अशरी, जाफरी, जैदी, इस्माइली, बोहरा, दाऊदी, द्रुज, खोजा आदि को रेखांकित किया जाने लगा। ऐसे में अहमदिया, कादियानी, खारजी, कुर्द और बहाई जैसे बटवारे को मान्यतायें दी जाने लगीं।

    दूसरी ओर हिन्दुओं को पहले शक्ति उपासक, शैव उपासक और वैष्णव उपासक में विभक्त किया गया और बाद में वर्ण को भी जन्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभक्त कर दिया गया। कालान्तर में ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज, जिझौतिया, सनाड्ड, सरयूपारी जैसे विभाजन दिये गये जबकि क्षत्रिय को सूर्यवंशीय, चन्द्रवंशीय में विभक्त करके अनेक उप जातियों में बांट दिया गया। वैश्य को महेश्वरी, बरनवाल, गहोई, अग्रवाल, अग्रहरी, खण्डेलवाल, वाष्णेय, पौडवाल जैसे भेद पैदा किये गये तो शूद्रों को कुम्हार, चमार, लुहार, बढई आदि में बांटकर दूरियां पैदा की गईं।

    स्वाधीनता के साथ ही सन 1947 में सामाजिक दूरियां बढाने वाले षडयंत्र का बीजारोपण करते हुए एससी, एसटी और ओबीसी का वर्ग विभाजन किया गया। सन 1953 में कालेलकर आयोग का गठन करके उसकी शिफारिशों को हौले से लागू कर दिया गया। इसी श्रंखला को आगे बढाते हुए सन 1979 में मंडल आयोग का गठन हुआ जिसने एक साल बाद सन 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में आरक्षण का मसौदा तैयार करवाने के बाद उसे लागू करने के लिए अवसर तलाशा जाने लगा।

    सन 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने इसे लागू करके जहरबुझी कटार से सामाजिक समरसता पर आक्रमण कर दिया। सन 1991 में राष्ट्रव्यापी तनाव को देखते हुए नरसिम्हा राव की सरकार ने दो कदम आगे चलकर अगडी जातियों के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण शुरू करके इसे परम्परा बना दिया। वर्तमान में तो बिहार की नीतीश सरकार ने तो 75 प्रतिशत तक के आरक्षण का धरातल तैयार कर लिया। भारी विरोध के बाद भी बिहार में जातिगत जनगणना कराई गई।

    हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में तो अनेक राजनैतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में भी जातिगत जनगणना का आश्वासन तक दे दिया था। जब देश को एकता, अखण्डता और अस्मिता को बरबादी की कगार पहुंचाने वाले जब सत्ता के गलियारे से ही मिसाइलें दागने लगें तो फिर उन्हें बचाने के लिए केवल और केवल परम शक्ति का सहारा ही शेष बचता है।

    विश्व गुरु के सिंहासन पर बैठने वाला देश आज अपनेे ही कल्याण के लिए तरसने लगा है। वैमनुष्यता का जहर फिजां में घुलता चला जा रहा है। कोई कट्टरता का भय दिखाता है तो कोई जबाबी हुंकार भरता है। कहीं हथियारों के जखीरे तैयार होते हैं तो कहीं भीड की आड में खून बहाया जाता है। तिस पर मुफ्तखोरी की नशीली खेपें पहुचाने की राजनैतिक होड चरम सीमा की ओर बढती चली जा रही है।

    वहीं दूसरी ओर ऊंच-नीच का भेदभाव, आरक्षण का लालच और लाभ कमाने की स्थितियों का झांसा देकर जातिगत संगठनों को विकसित करने की चालें सत्ता के लालची लोगों व्दारा चलीं जा रहीं है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि सामाजिक वैमनुष्यता फैलाने का प्रयास है जातिगत जनगणना जिसे अनेक दल अपने सत्ता संघर्ष में अमोघ शस्त्र मान चुके हैं। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ पुन: मुलाकात होगी।

     

    Dr. Ravindra Arjariya
    Accredited Journalist
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