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    भविष्य की आहट: वैचारिक परिवर्तन के बिना बंगाली जहर को रोकना कठिन

    डाॅ. रवीन्द्र अरजरिया

    भविष्य की आहट के इस कॉलम में आज हम बात करेंगे बंगाल की। भारतवर्ष को पतन के गर्त में पहुचाने में हमेशा से ही बंगाल अग्रणीय रहा है। यहीं से गोरों ने घुसकर देश को गुलाम बनाया था। बंगाल के ही फणीन्द्र नाथ घोष ने सैण्डर्स वध तथा असेम्बली बम काण्ड में गवाही देकर भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फांसी के फंदे तक पहुंचाया तथा पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के शव की शिनाख्त की थी।

    भारत मां की कोख में खंजर भौैकने वालों की देश में कमी नहीं है। बंगलादेशी घुसपैठियों की दम पर सत्ता चलाने वालों ने मनमाना आचरण करके चुनौतियों पर चुनौतियां प्रस्तुत की हैं। वहां की वर्तमान सरकार ने तो चार कदम आगे बढकर कभी राज्यपाल के अधिकारों को चुनौतियां दी कभी विभिन्न माफियों के संगठनों को खुला संरक्षण दिया। निर्वाचन काल में तो आतंक के साये में मतदान करवाने की पूरी इबारत ही लिखी गई।

    केन्द्रीय बलों को पंगु बनाने के सभी उपाय किये गये। राज्यपाल के काफिले तक को गुण्डों से बेइज्जित होने के दौर से गुजरना पडा। प्रादेशिक पुलिस की मौजूदगी में होने वाली घटनाओं से बदमाशों के मंसूबे निरंतर बढते चले जा रहे हैं। गुण्डों, घुसपैठियों और विदेशों से निर्देशित आतंकी गिरोहों की दम पर सत्ता हथियाने वाले लाल गलीचे पर पहुंचे ही राष्ट्रद्रोह के नये कथानक तैयार करने में लग जाते हैं।

    ऐसे में खुले घूम रहे अपराधी निरंतर पुलिस की मौजूदगी में ही अपने कारनामे कर गुजरते हैं। गोरांगडीह में एक बार फिर पालघर काण्ड दोहराने की पटकथा लिख दी गई थी जिसके मंचन हेतु सिटी पुलिस वालिंटियर अनवर शेख को निर्देशन की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। क्षेत्रीय सांसद ज्योर्तिमय महतो ने पहुंचकर किसी तरह से साधुओं की जान बचाई परन्तु स्थानीय पुलिस ने अपने वालिंटियर को गिरफ्तारी से दूर ही रखा। इसके पहले ईडी की टीमों पर जानलेवा हमलों की घटनायें मूर्त रूप ले चुकीं थीं।

    आरोपियों को सरकार का सुरक्षा कवच मिलने के कारण स्थानीय अधिकारियों के न केवल हाथ बंधे हैं बल्कि असंवैधानिक कृत्यों को निरंतर अदृष्टिगत करते रहने की बाध्यता भी है। सीमा पार से रोहिंग्याओं से लेकर बंगालादेशी मुस्लिम समुदाय की घुसपैठ कराने के लिए पूरी तरह से योजनाबध्द काम चल रहा है।

    इस हेतु कार्यालय, दलाल और आकाओं का तंत्र राजनैतिक संरक्षण में लम्बे समय से क्रियाशील है। घुसपैठ के रास्ते बताना, सीमा पर सैटिंग करके प्रवेश दिलाना, भारतीय नागरिक होने के दस्तावेज तैयार करवाना, बसने हेतु सुरक्षित इलाकों तक पहुंचाना और फिर उन्हें राष्ट्रघात के लिए प्रशिक्षित करने तक के विभाग चल रहे हैं।

    इन विभागों में काम करने वालों को विदेशों में बैठे उनके आका निरंतर धनापूर्ति कर रहे हैं। हवाला, फर्जी संस्थायें, धार्मिक समितियां, समाज सेवा संगठन आदि के नाम पर पैसों की आंधी चल रही है। इसमें अनेक जिम्मेवार अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका भी रेखांकित हो चुकी है परन्तु अधिकारियों के संगठन का दबाब, कानून की लचर व्यवस्था और सफेदपोशों की चीख चिल्लाहट की दम पर सब कुछ शान्त हो जाता है।

    बंगाल की गतिविधियों ने अब बिहार, तेलंगाना, झारखण्ड तथा छत्तीसगढ तक विस्तार पा लिया है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्य तो पहले से ही कट्टरपंथियों के शरणदाता रहे हैं। कश्मीर सीमा पर सख्ती होते ही बंगलादेश के रास्ते से पाकपरस्त लोगों की आमद तेज हो गई है। नेपाल का रास्ता तो पहले से ही घुसपैठियों के लिए खुला रहा है।

    चीन की चालों ने श्रीलंका, पाकिस्तान के बाद अब मालदीप को भी अपने शिकंजें में लेकर कंगाली की कगार तक पहुंचाने वाली अपनी विस्तावारवादी नीति को तेज कर दिया है, वहीं भारत के बढते कदों से घबडाकर उसे चारों ओर से घेरने की तैयारी तेज कर दी है। कट्टरपंथियों को विकास, सुविधायें और सहयोग का तिलिस्म दिखाकर अपना शिकंजा कसता जा रहा है।

    अमेरिका की दोगली नीतियां पहले से ही जगजाहिर हैं। भारत के घोटालेबाजों, आरोपियों तथा राष्ट्रद्रोहियों को शरण देने में ब्रिटेन हमेशा से ही अग्रणीय रहा है। वहां की अनेक शिक्षण संस्थायें भारतीय छात्रों को राष्ट्रद्रोह की छुपी शिक्षा देने से बाज नहीं आ रहीं हैं। ऐसे में देश के अंदर अनेक राजनैतिक दल विदेशियों के षडयंत्र के तहत मोहरा बनकर उनके मंसूबों को फलीभूत होने के लिए गुलामों की तरह काम कर रहे हैं।

    इस्लाम खतरे में है कहने वाले खद्दरधारियों की एक बडी जमात हमारे लोगों पर अन्याय हो रहा है, दूसरे लोग जुल्म कर रहे हैं, हमारे हाथ खोल दो-फिर देखो जैसे जुमलों को मंचों से आवाज दे रहे हैं। स्वयं को संतुलित कहने वाले दल भी ऐसे लोगों के साथ मिलकर सत्ता के लालच में देश का सौदा करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। जातिगत जनगणना, आरक्षण के साथ-साथ क्षेत्र, वर्ग, भाषा, समुदाय, संगठन जैसे कारकों के माध्यम से सामाजिक खाई खोदने वालों की संख्या निरंतर बढता जा रही है।

    वैचारिक परिवर्तन के बिना बंगाली जहर को रोकना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होता जा रहा है। लाभ का लालच, सुख की संभावना और वर्चस्व के बाहुल्य के हथियारों से सकारात्मक सोच पर आघात पर आघात हो रहे हैं और आम आवाम केवल मूक दर्शक बनी बैठी है। जब तक देश के निवासियों की सोच सहयोग, सौहार्य और सहायता पर केन्द्रत नहीं होगी तब तक स्वार्थी लोगों के व्दारा वैभव की बिसात बिछाकर निरीह लोगों को छला जाता रहेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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