बिरसा मुंडा ने याद दिला दी अंग्रेजों की क्रूरता की दास्तान...!

उलगुलान का नारा देकर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा ने किया विद्रोह
छतरपुर। भारत उदय सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान छतरपुर द्वारा भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा अनुदान प्राप्त पांच दिवसीय शंखनाद राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन किशोर सागर तालाब के समीप स्थित ऑडिटोरियम में किया जा रहा है। प्रथम दिन सागर की रंग प्रयोग संस्था के कलाकारों द्वारा अबुआ दिसुम अबुआ राज (बिरसा मुंडा)नाटक का मंचन किया गया। खचाखच भरे ऑडिटोरियम में दर्शकों ने बार बार तालियां बजाकर नाटक को भरपूर स्नेह दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ नगरपालिका अध्यक्ष ज्योति चौरसिया, वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र अग्रवाल, दमयंती पाणी, आभा श्रीवास्तव ने दीप प्रज्वलित करके किया। अतिथियों में भाजपा किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष बॉबी राजा गठेवरा, गांधी आश्रम की सचिव दमयंती पाणी, साहित्यकार आभा श्रीवास्तव और जिला विधिक सहायता अधिकारी हेमंत कुशवाहा मौजूद रहे। अपने उद्बोधन में बॉबी राजा ने कहा कि बिरसा मुंडा के बारे में सिर्फ सुना था लेकिन आज के जीवंत नाटक ने उनकी महानता को दिल में बसा दिया। दमयंती पाणी ने कहा कि छतरपुर में जिस स्तर का रंगमंच हो रहा है वह महानगरों की कमी नहीं खलने देता इसके लिए आयोजक टीम बधाई की पात्र है। आभा श्रीवास्तव ने कहा कि ऐसे आयोजनों के लिए समाज के हर वर्ग को सहयोग के लिए आगे आकर अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे जिन्होंने नाटक को भरपूर सराहा। कार्यक्रम का संचालन नीरज खरे ने किया।
यह थी कहानी
धरती आबा कहे जाने वाले आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा के विद्रोह पर आधारित इस नाटक में जन्म से लेकर उनके शहीद होने तक की कहानी का रोचक मंचन लगभग 25 कलाकारों की टीम के द्वारा किया गया। बचपन से ही जंगल और आदिवासी संस्कृति के प्रति प्रेम को लेकर अंग्रेज़ पादरी से बिरसा की बहस हो जाती है। दरअसल उस दौरान आदिवासियों की जमीनें सरकार ने अपने कब्जे में लेकर उनसे फल और पत्तियां तोड़ने तक का टैक्स लिया जाता था जिसका बिरसा ने पुरजोर विरोध किया और अबुआ दिसुम अबुआ राज यानि अपना देश अपना राज का नारा देकर आदिवासियों की विभिन्न प्रजातियों को इकट्ठा किया और इसके बाद शुरू हुआ उलगुलान। उलगुलान विद्रोह, आदिवासियों द्वारा अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ किया गया एक आंदोलन था। इस विद्रोह का नेतृत्व भगवान बिरसा मुंडा ने किया था। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को झारखंड के उलीहातू गांव में हुआ था। बिरसा मुंडा ने इस आंदोलन को 'उलगुलान' (महान विद्रोह) नाम दिया था। यह विद्रोह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता, और संस्कृति को बचाने के लिए किया गया था। इस विद्रोह के लिए अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया जहां उनकी मृत्यु हो गई।